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Contact Details

  • सम्पर्क सूत्र (Contact Details)-
ईमेल: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.
मोबाइल नंबर: 8989889371
पता: नाट्य परिषद्, संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.) पिनकोड-470003

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– नाट्यम के अंक यहाँ से डाउनलोड करें –
S.No. Title Download
1 नाट्यम अंक 89-90(विशाखदत्त विशेषाङ्क) PDF
2 नाट्यम अंक 91-94(रामजी उपाध्याय का नाट्य साहित्य) PDF
3 नाट्यम अंक 95-98 (शूद्रक विशेषाङ्क) PDF
4 नाट्यम अंक 99-102 (भट्टनारायण विशेषांक)

PDF-1

PDF-2

PDF-3

5 नाट्यम् अंक 103-104 PDF
6 नाट्यम् अंक 105-106 PDF
7 नाट्यम् अंक 107-108 PDF
8 नाट्यम् अंक 109-110 PDF
9 नाट्यम् अंक 111-112 PDF
10 नाट्यम् अंक 113-114 PDF

Instructions for Authors/Submission Guidelines

  • लेखक निर्देश: (Instructions for Authors)
  1. शोध आलेख संस्कृत उद्धरण के साथ, हिन्दी भाषा में ही स्वीकार किये जाते हैं।
  2. शोध आलेख का शीर्षक स्पष्ट, शोधपरक एवं विषयानुकूल होना चाहिये।
  3. लेखक का नाम, पदनाम, संस्था का नाम, ईमेल तथा मोबाइल नंबर, शोध पत्र के प्रथम पृष्ठ पर स्पष्ट रूप से उल्लिखित होना चाहिये।
  4. शोध आलेख- मंगल, कोकिला फॉन्ट, आकार- 14 (Font Size 14) में टंकित होना चाहिये।
  5. सन्दर्भ शैली (Citation Style) - MLA (Latest Edition) अनिवार्य रूप से अपनाई जानी चाहिए (उदाहरण- शास्त्री, डॉ. शिवराज, रत्नावली नाटिका, पृष्ठ संख्या, मेरठ: साहित्य भण्डार, 1998)।
  6. शोध आलेख की शब्द सीमा न्यूनतम 2500 से अधिकतम 3000 शब्द के मध्य होना चाहिए।
  • शोध आलेख में निम्न घटक अनिवार्यतः सम्मिलित हों-
  1. सारांश (Abstract)- (200-300 शब्द)
  2. मुख्य शब्द (Keywords)- (6 से 8 शब्द)
  3. प्रस्तावना
  4. विषय-वस्तु (स्वेच्छया तार्किक उपविभागों सहित)
  5. निष्कर्ष
  6. संदर्भ
  7. संदर्भ ग्रंथ सूची
  • अन्य अनिवार्य शर्तें-
  1. पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित शोधालेख ही पत्रिका में प्रकाशन हेतु स्वीकार्य हैं।
  2. लेखक के द्वारा मौलिकता से संबंधित घोषणा पत्र शोधालेख के साथ अवश्य संलग्न करना चाहिए।
  3. यूजीसी के मानकों के अनुसार प्लेगरिज्म (Plagiarism) 10% से कम होना अनिवार्य है।
  4. शोध आलेख के साथ अद्यतन Plagiarism Report संलग्न होना चाहिए।
  5. किसी अन्य पत्रिका में विचाराधीन शोध आलेख स्वीकार्य नहीं है।
  • रिव्यू प्रक्रिया-

 यूजीसी केयर लिस्टेड एवं पीयर रिव्यूड त्रैमासिक शोधपत्रिका

रिव्यू प्रक्रिया 

नाट्यम्, संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) की बहुमान्य श्रेष्ठ शोध पत्रिका है, जिसका मुख्य अकादमिक क्षेत्र रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र है, नाट्यम् अकादमिक शोध की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए प्राप्त शोध-पत्रों की एक वस्तुनिष्ठ सिंगल/डबल-ब्लाइंड रिव्यू प्रविधि अपनाती है, यह नाट्यम् में प्रकाशित शोध-पत्रों की गुणवत्ता, मौलिकता और तार्किकता को समृद्ध करने के लिए एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है।

नाट्यम् निम्नलिखित चरणों में पीयर रिव्यू प्रक्रिया को सम्पादित करती है:

  • प्रथम चरण: संपादक मंडल द्वारा शोधपत्रों की प्रारम्भिक निरीक्षण-

नाट्यम् पत्रिका का संपादक मंडल प्राप्त शोधपत्र की प्रारम्भिक निरीक्षण निम्नलिखित बिन्दुओं पर करता है-

  • शोधपत्र पत्रिका द्वारा निर्धारित किये गये मानकों को पूरा करता है- जैसे शोध-पत्र का विषय, लेख संरचना और फॉर्मेटिंग, साहित्यिक चोरी (प्लेजियरिज्म) प्रमाण-पत्र, लेख की मौलिकता का लेखक की ओर से घोषणा-पत्र आदि पत्रिका के दिशानिर्देशों के अनुरूप होना चाहिए।
  • शोधपत्र में मुख्य शोध-समस्या और उसका परिणाम स्पष्ट होना चाहिए।
  • शोधपत्र में डेटा प्राप्त करने और डेटा विश्लेषण की स्पष्ट पद्धति प्रयुक्त होनी चाहिए (साहित्य से सम्बंधित शोध-पत्रों को उनकी प्रकृति के आधार पर इस बिन्दु से छूट दी जा सकती है, जिसके संदर्भ में संपादक-मंडल का निर्णय अंतिम होगा।)
  • यदि पत्रिका का विशेषांक प्रकाशित होता है तो शोधपत्रों की विषयवस्तु विशेषांक की मूल भावना के अनुरूप होना चाहिए।
  • पत्रिका के क्रमागत अंक में लेखक की भिन्नता पूर्व निर्धारित है। अत: संपादक मण्डल के अतिरिक्त पत्रिका के क्रमागत अंक में समान लेखक का शोधालेख सम्मिलित नहीं होना चाहिए।
  • शोधपत्र के निष्कर्ष संबंधित शोध-क्षेत्र और विषय के विस्तार और व्यापकता के लिए सार्थक योगदान करने में सक्षम होना चाहिए।
  • द्वितीय चरण: संपादकीय निर्णय-

प्रथम चरण में सफल रहने के बाद द्वितीय चरण में उक्त शोध-पत्र के संदर्भ में उक्त निर्णय लिया जायेगा-

  • शोध-पत्र को समीक्षा के लिए भेजे जाने पर विचार।
  • यदि शोध-पत्र में सीमित स्तर पर किसी सुधार की आवश्यकता है तो उसकी पूर्ति के लिए लेखक को भेजा जायेगा।
  • प्रथम चरण के निरीक्षण बिन्दुओं में शोधपत्र के सफल रहने पर शोधलेखक को मेल द्वारा सूचित कर दिया जायेगा। चयनित शोधालेख एवं लेखकों की सूची विश्वविद्यालय के पोर्टल पर अपलोड की जाएगी।
  • शोध-पत्र का विषय, प्रस्तुति, प्रविधि और आशय आदि नाट्यम्, संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) की रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र गरिमा के अनुकूल होना चाहिए। अन्यथा की स्थिति में शोधपत्र पत्रिका में प्रकाशन योग्य नहीं माना जाएगा। इसके लिए संपादक मंडल कारण बताने के लिए बाध्य नहीं होगा।
  • तृतीय चरण: समीक्षक का चयन-

द्वितीय चरण में सफल रहने वाले शोधपत्र के विषयवस्तु और गुणवत्ता के परीक्षण के लिए गठित नाट्यम् पत्रिका के समीक्षक मण्डल में से विषय, कार्य, अनुभव और अकादमिक क्षमता के आधार पर उपयुक्त समीक्षक का चयन किया जाता है-

  • अंतरानुशासनिक प्रकृति के शोध-पत्रों की समीक्षा के लिए संपादक-मंडल अपनी समझ और अनुभव के आधार पर उपयुक्त समीक्षक का चयन करेगा।
  • नाट्यम् शोधपत्रों की वस्तुनिष्ठ समीक्षा के लिए सिंगल/डबल ब्लाइंड रिव्यू प्रविधि का पालन करता है, जिसमें लेखक और समीक्षक एक दूसरे की पहचान से अनभिज्ञ रहते हैं।
  • चतुर्थ चरण: समीक्षा प्रक्रिया-

इस चरण में चयनित समीक्षक द्वारा शोधपत्र की समीक्षा निम्नलिखित बिन्दुओं पर किया जाता है-

  • शोध आलेख का विषय, मौलिकता और नवीन दृष्टिकोण।
  • शोध आलेख की प्रासंगिकता, ज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान की संभावना।
  • स्पष्ट शोध पद्धति और विश्लेषण का तार्किक आधार।
  • भाषा की स्पष्टता, व्याकरणिक शुद्धता एवं सुव्यवस्थित संरचना।
  • संदर्भों का स्पष्ट एवं प्रामाणिक उल्लेख।
  • शोधपत्र पर AI, ChatGPT आदि का प्रभाव नहीं होना।
  • स्पष्ट और सटीक निष्कर्ष एवं सुझाव।
  • पंचम चरण: समीक्षक का प्रतिवेदन-
  • उपर्युक्त बिन्दुओं पर समीक्षा के उपरांत समीक्षक अपना प्रतिवेदन संपादक-मंडल को प्रेषित करता है।
  • प्रतिवेदन की भाषा और संरचना समीक्षक की सुविधा के अनुसार होनी चाहिए, जिसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख हो कि-
  • शोधपत्र प्रकाशन के योग्य है। इस टिप्पणी के बाद समीक्षक इसके समर्थन में बिन्दुओं का उल्लेख भी करेगा,
  • शोधपत्र में सुधार की आवश्यकता है। इस टिप्पणी के बाद समीक्षक इसके समर्थन में बिन्दुवार उन सुधारों का उल्लेख करेगा जिससे संपादक-मंडल संबंधित शोध-लेखक को अवगत करा देगा (इसके बाद शोध लेखक इस बात के लिए स्वतंत्र रहेगा कि संपादक-मंडल द्वारा दिए गये समयावधि में वह अपने शोधपत्र में पुनः सुधार कर भेजे या नहीं, सुधार कर पुनः भेजने की स्थिति में संपादक-मण्डल अपने स्तर पर उसका निरीक्षण करता है और सफल पाए जाने पर प्रकाशन की स्वीकृति लेखक को प्रदान करता है। शोध-आलेख में सुधार का केवल प्रथम प्रयास ही मान्य होगा, इसके लिए अन्य कोई अवसर लेखक को नहीं दिया जायेगा, सुधार हेतु प्रदत्त समयावधि के अनंतर उक्त शोधपत्र के प्रकाशन पर विचार नहीं किया जायेगा।)
  • सुधार के उपरांत शोधपत्र को पुनः प्रस्तुत करने की स्थिति में निम्नलिखित बिन्दुओं का अनुपालन अनिवार्य होगा-
  1. शोध-लेखक को समीक्षा प्रतिवेदन में बताए गए सभी सुझावों का पालन करना होगा।
  2. शोध-लेखक ने जिन बिन्दुओं में सुधार किया है, उसका अलग से स्पष्ट उल्लेख करना होगा।
  • शोधपत्र प्रकाशन योग्य नहीं है। इस टिप्पणी के बाद समीक्षक इसके समर्थन में बिन्दुओं का स्पष्ट उल्लेख करेगा। लेखक को अस्वीकृत किए गए शोधपत्र की सूचना पृथक् से नहीं दी जाएगी।
  • षष्ठ चरण: प्रकाशन प्रक्रिया-
  • इस चरण में प्रकाशन हेतु स्वीकृत शोधपत्रों का संपादक-मण्डल द्वारा पुनः निरीक्षण किया जाता है। स्वीकृत शोध आलेख नाट्यम् के किस अंक/विशेषांक में प्रकाशित होगा, इसके निर्णय का अधिकार केवल संपादक मंडल के पास रहेगा इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप/आग्रह और दबाव की स्थिति में संपदक मंडल शोधपत्र के प्रकाशन को अस्वीकृत कर सकता है।
  • शोधपत्र के प्रकाशन की स्वीकृति प्रदान किये जाने के बाद शोध लेखक उक्त शोधपत्र को कहीं अन्य स्थान पर प्रकाशन हेतु नहीं भेज सकेगा.
  • नाट्यम् रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र की त्रैमासिक यूजीसी केयर लिस्टेड एवं पीयर रिव्यूड शोध पत्रिका है, जो प्रकाशन की समयबद्धता का पालन करती है, किन्तु स्वीकृत शोधपत्रों के प्रकाशन में किसी भी तरह के अनपेक्षित विलंब की स्थिति में नाट्यम् संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) की किसी भी तरह की विधिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जा सकती। लेखक द्वारा नाट्यम् में शोधपत्र प्रकाशन के लिए भेजे जाने पर यह स्वतः प्रमाणित होगा कि वह नाट्यम् के उपर्युक्त सभी बिन्दुओं और नियमों को स्वीकार करता है।

प्रकाशन एवं शुल्क सम्बन्धी सूचना-

नाट्यम त्रैमासिक शोध पत्रिका में शोध-पत्र का प्रकाशन पूर्णतः नि:शुल्क  है। तथापि, शोध-आलेख की स्वीकृति के उपरांत पत्रिका की प्रति प्रेषण हेतु डाक-व्यय (स्पीड पोस्ट) सहयोग राशि के रूप में ₹100 देय होंगे। साथ ही, पत्रिका की सदस्यता हेतु शुल्क पृथक् से निर्धारित है

सदस्यता शुल्क (व्यक्तिगत) -

 एक वार्षिक - 2500 ₹  एवं डाक व्यय- 400 ₹

 पञ्च वार्षिक - 12500 ₹ एवं डाक व्यय-2000 ₹

सदस्यता शुल्क (संस्थागत/पुस्तकालय) –

एक वार्षिक – 5000 ₹  एवं डाक व्यय- 400 ₹

पञ्च वार्षिक - 25000 ₹ एवं डाक व्यय-2000 ₹

प्रत्येक विशेषांक का शुल्क प्रकाशक- नाट्य परिषद्, संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.) के द्वारा निर्धारित किया जाएगा।

सदस्यता शुल्क ऑनलाइन, मनीऑर्डर, चेक अथवा नगद माध्यम से नाट्य परिषद्, संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.) के बैंक खाते में जमा की जा सकती है। संबंधित शुल्क की रशीद नाट्य परिषद् को भेजनी अनिवार्य है।

Account Details: Name: THE NATYA PARISHAD, SAGAR V.V.SG

Account No.: 10186726875 (Current A/c) IFSC Code: SBIN0001143

Bank Name: State Bank of India, UTD Branch, Sagar (M.P.)

Editorial Board

  • संपादक मंडल (Editorial Board)

माननीय कुलपति, प्रो. (डॉ.) नागेश दुबे
संरक्षक
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
संस्थापक सम्पादक
प्रो. राजेन्द्र यादव
प्रधान सम्पादक
डॉ. शशिकुमार सिंह
सम्पादक
डॉ. नौनिहाल गौतम
सम्पादकमण्डल
डॉ. रामहेत गौतम
सम्पादकमण्डल
 
डॉ. किरण आर्या
सम्पादकमण्डल
 
प्रो. कुसुम भूरिया
परामर्शमण्डल
प्रो. जयशंकरलाल त्रिपाठी
परामर्शमण्डल
प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी
परामर्शमण्डल
प्रो. अजय कुमार मिश्रा
परामर्शमण्डल
डॉ. सी.एच. नागराजू
परामर्शमण्डल
 


 
प्रकाशक- नाट्य परिषद्, संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर (म.प्र.)

Introduction

  • परिचय (Introduction)-

               "नाट्यम्" रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र की यूजीसी केयर लिस्टेड पीयर रिव्यूड त्रैमासिक शोध पत्रिका है, जिसका आरम्भ विक्रम संवत् 2049 (1982 ई.) में संस्कृत जगत् के विश्व प्रसिद्ध मनीषी एवं संस्कृत साहित्यकार आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी के द्वारा किया गया था। यह पत्रिका नाट्य परिषद्, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर मध्यप्रदेश के द्वारा सतत रूप से प्रकाशित की जा रही है। नाट्यम् शोधपत्रिका अपने गुणात्मक एवं ज्ञानात्मक शोधालेखों के कारण विश्वविश्रुति को प्राप्त है। रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र के विविध संदर्भों को युक्तियुक्तपूर्ण रूप से व्याख्यायित करने वाली यह श्रेष्ठ शोध पत्रिका साहित्य मर्मज्ञों के प्रभूत आदर को प्राप्त है। वर्ष में त्रैमासिक रूप में प्रकाशित होने वाली नाट्यम् शोध पत्रिका का ISSN: 2229-5550 है। नाट्यम् पत्रिका का उद्देश्य रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र के मर्मस्पर्शी संदर्भों को उद्घाटित करने वाले गुणवत्तापूर्ण शोधालेखों का प्रकाशन है। जिसमें समीक्षण, विश्लेषण, पल्लवन आदि के साथ-साथ पत्रिका में सम्मिलित शोधालेखों में विद्यमान नैतिकता, गुणवत्ता, मूल्यनिष्ठा, मौलिकता, तार्किकता आदि से संबंधित सभी पहलुओं को स्पष्ट एवं पारदर्शी रूप में परिभाषित करना है। संस्कृत की प्रमुख शोधपत्रिकाओं में नाट्यम् का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सन् 1982 से अद्यावधि निरंतर प्रकाश्यमान नाट्यम् शोधपत्रिका के शताधिक अंक प्रकाशित हो चुके हैं। नाट्यम् शोधपत्रिका के प्रथम अंक मे ४-५वीं शती के सुप्रसिद्ध कवि दिंगनाग द्वारा रचित श्रेष्ठ संस्कृत नाटक ‘कुंदमाला’ का हिन्दी अनुवाद, सन् 1982 में प्रकाशित हुआ था। ‘नाट्यशास्त्र के बीजशब्द’ पर डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी एवं डॉ.कुसुम भूरिया, १४वीं शताब्दी के प्रसिद्ध रचनाकार भास्कर विरचित ‘उन्मत्तराघव’ प्रेक्षणक का हिन्दी अनुवाद पर डॉ. इन्द्रमोहन सिंह के महत्त्वपूर्ण आलेख इस अंक के प्रमुख आकर्षण हैं। सन् 1983 में कावालम नारायण पणिक्कर प्रणीत ‘स्थित है सूर्य’ नाटक, डॉ.विंध्येश्वरी प्रणीत ‘संस्कृत रंग परंपरा से प्रभावित कुछ हिन्दी नाटक’, क्षेत्रवासी पंडा प्रणीत ‘देवीचंद्रगुप्त एवं विशाखदत्त का अनुपलब्ध नाटक’, प्रेम शंकर सिंह प्रणीत ‘मैथली रंगमंच का उद्भव एवं विकास’ आदि शोधालेखों का प्रकाशन हुआ। सन् 1984 में डॉ. कुसुम भूरिया के द्वारा ‘शाकुंतल के अभिनय की कालिदास दर्शित दिशा’, सन् 1985 में निशांत केतु के द्वारा ‘नाट्यशास्त्रीय परिभाषिक शब्दों अर्थच्युति’, बच्चन त्रिवेदी के द्वारा ‘रंगकर्म की सार्थकता’, डॉ. इन्द्रमोहन सिंह के द्वारा ‘प्रबुद्धरोहणीय अभिनेयता’ आदि विषयों पर सारगर्भित शोधालेख प्रकाशित हुए। सन् 1986 में ‘मणिपुरी नट संकीर्तन में पूर्वरंग’- सनक्य एबोटोंबी, ‘भारतीय गीतिनाट्य उद्भव एवं विकास’- डॉ. चंद्रकांत शुक्ल, ‘संस्कृत रंगमंच पर एक नया उपक्रम- वीणावासवदत्ता’- इसरार मोहम्मद खाँ; सन् 1987 में ‘बालीद्वीप की रंगमंचीय परंपरा’- डॉ.राजेन्द्र मिश्र, ‘आधुनिकता बोध और सौन्दर्यशास्त्र’- डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी, ‘भवभूति की कविता में मनोराज्य का चित्रण’- डॉ. राजेन्द्र मिश्र, ‘त्रासदी की भारतीय अवधारणा और भवभूति के नाटक’- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी; सन् 1988 में ‘संक्षिप्त नाट्यशास्त्रम्, नाट्यशास्त्र और संस्कृत नाटककार/अभिनय दैहिक भाषा का अनुशासन, भास के पञ्चरात्र की अनुरचना’- राजेन्द्र जोशी; सन् 1989 में ‘विघ्नेशजन्मोदय: एक अपारंपरिक संस्कृत नाटक’- डॉ. मालिनी गोस्वामी, ‘प्रसाद के नाटक: अंतर्वस्तु और शिल्प’- डॉ राधावल्लभ त्रिपाठी; सन्1990 में ‘रंगमंच तथा यज्ञ’- राजकमल नायक; सन् 1992 में ‘नाटक कैसे देखना चाहिए’ अनुवाद- डॉ.आशा सर्वटे, ‘पारंपरिक रंगमंच, समकालिकता, आधुनिकता और भारतीयता’- कमलेशदत्त त्रिपाठी; सन् 1996 में ‘नाट्यशास्त्रीय अभिनय विधान और संस्कृत नाटक’- कमलेशदत्त त्रिपाठी, ‘पूर्वरंग की व्याप्ति और पाठ्ययोग’- राममूर्ति त्रिपाठी; सन् 1997 में ‘समसामयिकता विचारधारा और रंगमंच’- नाग बोडस, ‘नाट्यशास्त्र का लक्षण सिद्धांत’- कुसुम भूरिया; सन् 1998 में ‘लद्दाख के लोकनृत्य’- सुषमा गुप्ता; सन् 1999 में ‘नाट्यशास्त्र संस्कृत नाटक तथा विश्वरंगमंच’- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी, ‘निर्देशक का रंगमंच’- महेश चंपकशाह, सन् 2000 में ‘संस्कृत नाटक और आधुनिक रंगकर्म’ (कुमारी संगीता की हबीब तनवीर से बातचीत), मुझे मौत दी क्यों नाटक- कमल वशिष्ठ, ‘21वीं शताब्दी में नाट्य वास्तु प्रासंगिकता एवं उपादेयता’- डॉ इच्छाराम द्विवेदी, ‘नाट्यम् का स्वर्णजयंती विशेषांक, संस्कृत नाटकों में राम का चरित्र: नई योजनाएं’- देवर्षि कमलनाथशास्त्री, सन् 2001 में ‘नाट्यशास्त्र नवीन पाठ की आवश्यकता’- कमल वशिष्ठ, ‘नई सहस्त्राब्दी में नाट्यशास्त्र’- कमलेशदत्त त्रिपाठी, ‘भारतीय सौन्दर्यशास्त्र: समस्याएं और संभावनाएं’- प्रियदर्शी पटनायक, ‘बौद्धरंगमंच;- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी; सन् 2002 में ‘ऐतरेय महिदास की कलादृष्टि’- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी, ‘काश्मीर शैवदर्शन की सौन्दर्य दृष्टि’- नवजीवन रस्तोगी, सन् 2003 में ‘रूपक तथा उपरूपक की परंपरा’- श्रीमती ऊर्मि गुप्ता, सन् 2004 में ‘स्वप्नवासदत्तम्-स्नेह के ताने बाने का नाटक’- हर्षदेव माधव; सन् 2005 में ‘महावीरचरित  की रामकथा और भवभूति का वैशिष्ट्य’- बनमाली बिश्वाल, ‘नीमड़ का लोकनाट्य गम्मत और संस्कृत नाटक’- डॉ. ओमप्रकाश राजपाली, ‘नेपालीय पाण्डुग्रन्थों में नाट्यशास्त्र के षष्ठ एवं सप्तम अध्यायों के कुछ महत्त्वपूर्ण पाठ : एक प्रयोग परक दृष्टि’- अन्विता शर्मा, ‘संस्कृत साहित्य में नाटिका’- महेश द्विवेदी, ‘समकालीन परिप्रेक्ष्य में नाट्यशास्त्र की प्रासङ्गिकता’- सविता ओझा, ‘बाली में रामायण और महाभारत की प्रयोग परंपरा’- आइ. केतुत सूबगियास्ता, ‘मन्दाकिनी के लोकमानस में महाभारत निहितार्थ’- धर्मानन्द शर्मा, ‘नाट्य प्रयोग में सन्ध्यङ्गों का औचित्य’-कुसुम भूरिया, ‘क्रांति का विचार और संस्कृत नाटक’-सत्येंद्र तनेजा, ‘अभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत एकांकी में समकालीन समाज का यथार्थ’- सविता ओझा, ‘नाट्यशास्त्र : भरत के अभिनय सूत्र’- गौतम चटजी, ‘साम्प्रतिक संस्कृत रंग लोक की बिखरी अनुसंधानात्मक प्रवृत्तियाँ’- अजय कुमार मिश्र, ‘ब्रज की रास लीला का सौन्दर्य चिन्तन’-अभिराज राजेन्द्र मिश्र, ‘संस्कृत-नाटक पर ग्रीक प्रभाव की अवधारणा’- डॉ. स्मिता अग्रवाल, ‘भरत का नाट्य-शास्त्र और पारंपरिक भारतीय रंगमंच : भारतीय रंगमंच की पहचान का प्रश्न तथा समकालीन रंगमंच पर नाट्यशास्त्रीय परंपरा का प्रभाव’- कमलेश दत्त त्रिपाठी, ‘अंग्रेजी से हिन्दी अनु’.- हिमांशु शेखर झा, ‘सङ्गीतशास्त्र की परंपरा’- डॉ. संजय द्विवेदी, ‘दूतवाक्यम् में प्रयुक्त चित्रपट दुर्योधन की मानसिकता का सटीक चित्रण’- डॉ. महेश चम्पकलाल, ‘संस्कृत-प्राकृत-रूपकों एवं उपरूपकों की वर्तमान रङ्गमञ्चीय स्थिति’- सुमनकुमार झा, ‘कथा श्रीराधा की’ राधावल्लभ त्रिपाठी (नाट्यत्रयी का अनुवाद : कौशल तिवारी), ‘नाट्यशास्त्र विशेषांक’-2017, ‘नाट्य-शास्त्र के विकास में नाट्य दर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र का योगदान’- संगीता मेहता, ‘हर्ष के रूपकों की भाषा शैली एवं अभिनेयता’-गोकुलप्रसाद त्रिपाठी, ‘कूटनीति के निकष पर मुद्राराक्षस’- सज्जय कुमार 2018, ‘संस्कृत नाटकों में मुख्यधारा से इतर पात्रों का चारित्रिक विश्लेषण’- सरोज कौशल, ‘विशाखदत्त विशेषाङ्क’-2019, ‘रामजी उपाध्याय का नाट्य साहित्य’- 2020 ।

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